प्रिय साथियों,
“माँ अहल्या शिक्षा न्यास” की कल्पना लंबे समय से मेरे मन में थी। इस विचार के मूल में उस भूमि और समाज के प्रति मेरी आंतरिक पीड़ा और गहरी जिम्मेदारी रही है, जहाँ मेरा जन्म और पालन-पोषण हुआ।
अपने कर्तव्यों के निर्वहन की भावना से प्रेरित होकर, समाज के लिए कुछ सार्थक करने का संकल्प लिया। इसी उद्देश्य को लेकर मैंने कुछ समाजबंधुओं से संवाद प्रारंभ किया। माँ अहल्या और महर्षि गौतम जी की कृपा से, यह विचार कई प्रमुख बंधुओं तक पहुँचा और उनके साथ विचार-विमर्श के पश्चात् यह निर्णय लिया गया कि हम सब मिलकर पहली बार माँ अहल्या जी का प्राकट्योत्सव मनाएंगे।
यह ऐतिहासिक आयोजन संवत् 2082, चैत्र शुक्ल तृतीया को जोधपुर गौतम सभा भवन में सम्पन्न हुआ, जिसमें मातृशक्ति के सहयोग से माँ अहल्या प्राकट्योत्सव बड़े ही उत्साह, श्रद्धा और गरिमा के साथ मनाया गया। इस अवसर पर न्यास के शुभांकर का अनावरण भी किया गया और यह संकल्प लिया गया कि समाज के सहयोग से हम प्रतिभाशाली छात्र-छात्राओं का उनके परिवार सहित सम्मान करेंगे।
भारतीय परंपरा “वसुधैव कुटुम्बकम्” — पूरी दुनिया को एक परिवार मानने की भावना पर आधारित रही है। इसी भाव को आत्मसात करते हुए हमें समाज के प्रत्येक घर तक पहुँचना है, संवाद स्थापित करना है, और भावी पीढ़ियों के उज्जवल भविष्य हेतु उचित मार्गदर्शन प्रदान करते हुए उनके वर्तमान को सशक्त बनाना है।
क्योंकि —
जिस समाज का वर्तमान सशक्त होगा, उसी का भविष्य उज्ज्वल होगा।
आप सभी से इस पुनीत कार्य में सहभागिता और समर्थन की आशा करता हूँ।
सादर वंदे
महेन्द्र उपाध्याय
(संस्थापक — माँ अहल्या शिक्षा न्यास)