शुभंकर (लोगो) माँ अहल्या शिक्षा न्यास के शुभंकर की अवधारणा श्रवण कुमार उपाध्याय एव महेंद्र उपाध्याय ने बनाई। जिसको साकार रूप अवदेश उपाध्याय ने दिया। शुभंकर स्वास्तिक का आकार लिये हुए है।जिसमें माँ अहल्या शिक्षा न्यास के चार स्तम्भ को दर्शाया गया है।जो शिक्षा,संस्कृति,सेवा,और संस्कार हैं।चार दल कमल के भीतर कमल के भीतर न्यास का ध्येय वाक्य “ब्रह्म विद्वान यथा” अंकित किया गया है।शुभंकर के मध्य में कुम्भ रखा गया है।कुम्भ मनुष्य की सांसारिक बाधाओं को दूर करते हुए उसके जीवन को ज्ञानामृत से परिपूर्ण कर देता है।इसलिए इसमें कुम्भ दर्शाया गया है। “कुम्भ” शब्द की मीमांसा पांच ज्ञानेन्द्रिय, पांच कामेन्द्रिया,एक चित्त और एक मन से की गई है।इन द्वादश इन्द्रियों पर विजय पाने से ही घट”कुम्भ” यानि शरीर का कल्याण होता है। कुम्भ व्यक्ति को ऐश्वर्य सम्पन्न बनाने की एक संकल्पना है।कुम्भ पुरूषार्थ चतुष्टय अर्थात धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्ति का ध्योतक है। ” चतुरः कुम्भां चतुर्णा ददामि क्षीरेण पूर्णान् उदकेन दध्मः”। कलश के साथ माँ अहल्या का विग्रह दर्शाया गया है।
रचियता:-
नन्दकिशोर शर्मा “नेक “,
जोधपुर (राजस्थान)
आरती- ॐ जय अहल्या माता
(तर्ज – ओम जय जगदीश हरे…….)
ॐ जय अहल्या माता, हो जय अहल्या माता।
निज कुल की तुम जननी,मुद मंगल दाता।।स्थाई।।
ॐ जय अहल्या माता……..
पंच तत्व ले ब्रह्मा, अद्भुत रचना करी।
गुण संग रूप सजायो,निज की पुत्री करी।।1।।
ॐ जय अहल्या माता……..
चेतन तत्व समायो, जीवन दान दियो।
सुता की सुन्द मूरत,अहल्या नाम दियो।।2।।
ॐ जय अहल्या माता……..
समरथ गुरु को ढूंढा,ऋषि गौतम को पाया।
अहल्या को शिक्षा हेतु,उनको सम्हलाया।।3।।
ॐ जय अहल्या माता……..
शास्त्र शस्त्र की शिक्षा, गुरुवर ने दीनी।
धर्म कर्म समझाये,नीति निपुण कीनी।।4।।
ॐ जय अहल्या माता……..
सकल ज्ञान को देकर, शिष्य सफल करी।
विधना को जा सोंपी, सुता सब ज्ञान भरी।।5।।
ॐ जय अहल्या माता……..
देव दनुज सब हीन, मांगी पर ना दीनी।
ब्रह्मा ने वर ढूंढा, गौतम को ही दीनी।।6।।
ॐ जय अहल्या माता……..
ऋषि गौतम वर पायो,अहल्या धन्य भई।
पति सेवा में लागी,सती तो मगन भई।।7।।
ॐ जय अहल्या माता……..
पति पुत्र संग सती ने, जीवन धन्य कियो।
कष्ट मिटे सब जन के,अहल्या नाम लिये।।8।।
ॐ जय अहल्या माता……..
अहल्या माँ की आरती, जो कोई नर गावे।
कष्ट मिटे तन-मन के,भव से तर जावे।।9।।
ॐ जय अहल्या माता……..
सदा मात को ध्यावे,लगन ये मन लागी।
‘नेक ‘ ‘श्रवण ‘अब माँ के चरणन अनुरागी।।10।।
ॐ जय अहल्या माता……..
डॉ विपिन कुमार द्विवेदी
फतेहपुर, उत्तर प्रदेश
अहल्याचरितम्
वृत्त- शिखरिणी
अहल्या श्रेष्ठासौ विमलचरिता लोकविदिता,
प्रभाते सुस्मर्या कलिमलहरा ब्रह्मतनया।
परा विश्वे रम्या विधिवरकृतिर्गौतमभृता,
नमस्या सश्रद्धं सुपदकमला भोगविगता।।
भवे कन्या: पंच प्रथितचरिता भारतभुवि,
समाजस्य प्राणा: प्रकृतिमधुरा: पावकविभा:।
प्रसिद्धा तास्वेका गतमलिनभावा सुखकरी,
सुवन्द्याहल्यासौ स्मरत हितहेतो: प्रतिदिनम्।।
वसन्ती संसारे मुदितहृदया धारितवती,
स्वकर्तव्यं स्त्रीणां श्रुतिकुलसमेता मधुमयी।
अहल्या नारीणां मुकुटमणिदीप्तिर्गुणयुता,
भजन्तां तां नित्यं सकलमनुजा आत्मयतये।।
महाभूतेष्वेकं कथितममलं तत्त्वमनल:,
प्रसिद्धाहल्यासौ गुणगणयुता धर्मनिरता।
सुषुम्नानाडी वै व्रतनियमतप्ता त्वभिहिता,
दयामूर्तिर्माता कुरु निजकृपां मानवकुले।।
अनिन्द्यं ते वृत्तं नरनिवहगेयं शुभकरम्,
अहिल्ये हे मात: नहि किमपि जाने तव तप:।
पुराणैस्ते गीतं सुधवलयशो दिक्षु लसितम्,
नुमस्त्वां नित्यं हे भवविकटबन्धं हर मम।।
श्रवण कुमार उपाध्याय
– भारतीय ज्ञान परंपरा विचारक
महेन्द्र उपाध्याय
(संस्थापक — माँ अहल्या शिक्षा न्यास)
प्रिय साथियों,
“माँ अहल्या शिक्षा न्यास” की कल्पना लंबे समय से मेरे मन में थी। इस विचार के मूल में उस भूमि और समाज के प्रति मेरी आंतरिक पीड़ा और गहरी जिम्मेदारी रही है, जहाँ मेरा जन्म और पालन-पोषण हुआ।
अपने कर्तव्यों के निर्वहन की भावना से प्रेरित होकर, समाज के लिए कुछ सार्थक करने का संकल्प लिया। इसी उद्देश्य को लेकर मैंने कुछ समाजबंधुओं से संवाद प्रारंभ किया। माँ अहल्या और महर्षि गौतम जी की कृपा से, यह विचार कई प्रमुख बंधुओं तक पहुँचा और उनके साथ विचार-विमर्श के पश्चात् यह निर्णय लिया गया कि हम सब मिलकर पहली बार माँ अहल्या जी का प्राकट्योत्सव मनाएंगे।
यह ऐतिहासिक आयोजन संवत् 2082, चैत्र शुक्ल तृतीया को जोधपुर गौतम सभा भवन में सम्पन्न हुआ, जिसमें मातृशक्ति के सहयोग से माँ अहल्या प्राकट्योत्सव बड़े ही उत्साह, श्रद्धा और गरिमा के साथ मनाया गया। इस अवसर पर न्यास के शुभांकर का अनावरण भी किया गया और यह संकल्प लिया गया कि समाज के सहयोग से हम प्रतिभाशाली छात्र-छात्राओं का उनके परिवार सहित सम्मान करेंगे।
भारतीय परंपरा “वसुधैव कुटुम्बकम्” — पूरी दुनिया को एक परिवार मानने की भावना पर आधारित रही है। इसी भाव को आत्मसात करते हुए हमें समाज के प्रत्येक घर तक पहुँचना है, संवाद स्थापित करना है, और भावी पीढ़ियों के उज्जवल भविष्य हेतु उचित मार्गदर्शन प्रदान करते हुए उनके वर्तमान को सशक्त बनाना है।
क्योंकि —
जिस समाज का वर्तमान सशक्त होगा, उसी का भविष्य उज्ज्वल होगा।
आप सभी से इस पुनीत कार्य में सहभागिता और समर्थन की आशा करता हूँ।
सादर वंदे
महेन्द्र उपाध्याय
(संस्थापक — माँ अहल्या शिक्षा न्यास)